नीला नाम का एक सियार — हालाँकि तब तक यह उसका नाम नहीं था — एक रात जूठन की तलाश में शहर चला गया, और शहर के कुत्तों ने उसे पहले ढूँढ़ लिया।
वह भागा। वे झुंड बनाकर पीछे पड़े, और वह एक दीवार फाँदकर पहले खुले आँगन में जा गिरा — और वह आँगन एक रँगरेज़ का था, और उसके बीचों-बीच रखा था एक विशाल हौद।
वह सीधा उसी में जा गिरा।
जब वह निकला, दूर वाली दीवार लाँघकर जंगल लौटा, तो वह नीला था। नीला-सा नहीं। नीला — गहरा, एकसार, शानदार नील — नाक से लेकर पूँछ की नोक तक।
जिस पहले जानवर ने उसे देखा, वह चीख़ पड़ा।
दिन भर में पूरे जंगल ने उसे देख लिया और किसी को समझ नहीं आया कि यह है क्या। सियार तो नहीं था। सियार नीले नहीं होते। वह कुछ भी ऐसा नहीं था जिसे कोई नाम दे सके — और जंगल में, जिस चीज़ का नाम न हो, उससे कोई बहस नहीं करता।
तो नीला — जो एक दिन पहले जान बचाकर भाग रहा था — तनकर खड़ा हुआ और बोला, "मुझे स्वयं इंद्र ने बनाया और तुम्हें राज करने भेजा है।"
और उन्होंने मान लिया।
वह एक मौसम तक राजा रहा, और अच्छा राजा रहा। शेर को पद दिया, बाघ को पद दिया, तेंदुए को पद दिया। बरगद के नीचे दरबार लगाया। सबसे पहले खाया। और चूँकि वह किसी ऐसे को पास नहीं रख सकता था जो सूँघकर पहचान ले कि वह असल में है क्या — उसने जंगल के हर सियार को धक्के और गालियाँ देकर भगा दिया। और वे चले गए।
फिर एक शाम, दूर कहीं, सियार हुआँ-हुआँ करने लगे।
यह वही आवाज़ थी जो नीला इससे पहले ज़िंदगी की हर रात निकालता आया था। वह उसके भीतर काँटे-सी धँस गई। आँखें भर आईं। छाती उठी। पूरा शरीर वह याद कर बैठा जिसे दिमाग़ पूरा मौसम दबाता रहा था —
— और उसने गर्दन पीछे फेंककर हुआँ भर दी।
दरबार बिलकुल चुप हो गया।
फिर खड़ा हो गया।
उस रात वह जंगल की सरहद पार कर गया — कुछ भी लिए बिना: न पद, न बरगद, न नाम। हफ़्तों तक वह नीला बना रहा। फिर बारिश में धीरे-धीरे उतर गया, जैसे रंग उतरते हैं।